ईसाई धर्म अपनाने वाले व्यक्ति को SC/ST एक्ट का लाभ नहीं- SC
अदालत ने कहा— हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म तक ही सीमित है अनुसूचित जाति की मान्यता
New Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के उस निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया था कि यदि कोई व्यक्ति ईसाई धर्म अपना लेता है और उसका खुले तौर पर पालन करता है, तो वह अनुसूचित जाति (SC) का सदस्य नहीं माना जाएगा।
शीर्ष अदालत की बेंच ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जाति का दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायियों तक ही सीमित है। अदालत ने कहा कि किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करने पर व्यक्ति को SC का संवैधानिक लाभ नहीं मिल सकता।
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यह मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा था, जिसने ईसाई धर्म अपनाकर पादरी के रूप में कार्य करना शुरू कर दिया था। उसने कुछ लोगों के खिलाफ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें उसने सुरक्षा की मांग की थी।
हालांकि, आरोपियों ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि संबंधित व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर चुका है और सक्रिय रूप से ईसाई धर्म का पालन कर रहा है, इसलिए वह SC/ST एक्ट के तहत संरक्षण का हकदार नहीं है।
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अप्रैल 2025 में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था का कोई स्थान नहीं है, इसलिए धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति को अनुसूचित जाति के अधिकारों का लाभ नहीं मिल सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने उसे SC/ST एक्ट की धाराओं के उपयोग से वंचित कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को भविष्य में धर्म परिवर्तन और आरक्षण से जुड़े मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।



