भारत की रूस से तेल खरीद पर अमेरिका नाराज, ट्रंप और रुबियो ने जताई नाखुशी

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New Delhi: नई दिल्ली और वॉशिंगटन के बीच हाल के दिनों में तनाव का कारण भारत की रूस से तेल खरीद बना हुआ है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और विदेश मंत्री मार्को रुबियो दोनों ने भारत के इस फैसले पर खुलकर नाराज़गी जताई है. रुबियो ने 31 जुलाई को फॉक्स रेडियो को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि भारत की ओर से रूस से तेल खरीदना यूक्रेन में जारी युद्ध को अप्रत्यक्ष रूप से फंड करने जैसा है. उन्होंने इसे अमेरिका-भारत संबंधों में “एक निश्चित रूप से चिढ़ का विषय” बताया.

रुबियो ने कहा कि रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण वह अंतरराष्ट्रीय कीमतों से सस्ता तेल बेच रहा है, और भारत इसका लाभ उठाते हुए अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी कर रहा है. उन्होंने माना कि भारत की ऊर्जा आवश्यकताएं बहुत बड़ी हैं, लेकिन इसके बावजूद अमेरिका को यह रास नहीं आ रहा कि भारत रूस से तेल ले रहा है.

पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी इस मुद्दे पर नाराज़गी जाहिर कर चुके हैं. उन्होंने पहले भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ की घोषणा करते हुए साफ तौर पर कहा था कि भारत की रूसी तेल खरीद अमेरिका के हितों के खिलाफ है. ट्रंप ने कहा कि भारत के पास तेल खरीद के लिए कई अन्य विकल्प हैं, लेकिन फिर भी वह रूस को प्राथमिकता दे रहा है.

इस मुद्दे के इतर भी अमेरिका और भारत के बीच कई व्यापारिक मसलों पर मतभेद हैं. अमेरिका भारत से कृषि और डेयरी क्षेत्रों में बाजार खोलने की मांग कर रहा है, ताकि अमेरिकी उत्पादों जैसे मक्का, सोयाबीन, सेब और बादाम को भारतीय बाजार में प्रवेश मिल सके. लेकिन भारत ने इस मांग को खारिज कर दिया है. भारत का तर्क है कि सस्ते अमेरिकी कृषि उत्पादों को अनुमति देने से करोड़ों छोटे किसानों की आजीविका पर संकट आ सकता है.

भारत ने विशेष रूप से स्पष्ट किया है कि वह डेयरी, चावल, गेहूं और जीएम (आनुवंशिक रूप से संशोधित) फसलों पर टैरिफ में ढील नहीं देगा. सरकार का मानना है कि इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जिसमें लगभग 70 करोड़ लोग शामिल हैं, बुरी तरह प्रभावित हो सकती है. इनमें से करीब 8 करोड़ छोटे डेयरी किसान हैं. इस तरह, भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी होने के बावजूद आर्थिक और भू-राजनीतिक हितों के टकराव से रिश्तों में खटास बनी हुई है.

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