जगन्नाथपुर रथयात्रा: आस्था, परंपरा और संस्कृति का भव्य संगम

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Ranchi: रांची के ऐतिहासिक जगन्नाथपुर मंदिर धुर्वा से शुक्रवार को भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र की रथयात्रा की भव्य शुरुआत हुई. श्रद्धालुओं की अपार भीड़ और भक्तिभाव के वातावरण में तीनों श्रीविग्रहों को विधिवत पूजा-अर्चना के बाद रथ पर सवार कर मौसी घर (मौसीबाड़ी) ले जाया गया. सुबह से ही मंदिर परिसर में जनसैलाब उमड़ पड़ा. हर कोई रथ को छूने और भगवान को मौसीबाड़ी तक पहुंचाने की अभिलाषा में अनुष्ठान में शामिल हो रहा था.

रथयात्रा के दौरान मंत्रोच्चार, वाद्ययंत्रों की ध्वनि और श्रद्धालुओं के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया. मंदिर परिसर से लेकर मौसीबाड़ी तक भक्ति की बयार बह रही थी. यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समर्पण, सामाजिक एकता और मानवता का प्रतीक बन गया है. परंपरा के अनुसार भगवान अगले नौ दिनों तक मौसीबाड़ी में निवास करेंगे, जहां उन्हें गुंडीचा भोग अर्पित किया जाएगा. इसके बाद वे घूरती रथ के माध्यम से पुनः मुख्य मंदिर लौटेंगे.

जगन्नाथपुर मंदिर न्यास समिति के सदस्य और बड़कागढ़ स्टेट के प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी ठाकुर सुधांशुनाथ शाहदेव ने बताया कि रथयात्रा की शुरुआत 1691 में नागवंशी राजा ठाकुर एनी नाथ शाहदेव ने की थी. तब से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है. उन्होंने इसे झारखंड की सांस्कृतिक विरासत बताते हुए श्रद्धालुओं से श्रद्धा और अनुशासन के साथ इसमें भाग लेने की अपील की.

रथ मेला केवल धार्मिक आयोजन न होकर सांस्कृतिक और पारंपरिक जीवनशैली का भी उत्सव है. मेले में गाय, बकरी और भैंस के गले में बांधने वाली घंटियां, चावल छानने वाले झंझरा जैसी पारंपरिक वस्तुएं आकर्षण का केंद्र रहीं. दूर-दराज से आए लोग इन चीजों की खरीदारी करते नजर आए. ये वस्तुएं न केवल ग्रामीण संस्कृति की पहचान हैं, बल्कि सैकड़ों कारीगरों की आजीविका का आधार भी हैं.

इस आयोजन की भव्यता और जनभागीदारी हर साल बढ़ती जा रही है. रथ मेला को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने के लिए सरकार को आगे आना चाहिए. जिला प्रशासन रांची और मंदिर न्यास समिति इस आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.

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