Jharmedia : कहानी 1960 के दशक की है, तब के समाज में जाति से बड़ा कुछ नहीं था और अंतरजातीय विवाह तो मानो बवंडर मचाने जैसा था, लेकिन दिल के तार कहां किसी नियम-कायदे से चलते हैं! हर्ष, जो जैन थे और मृदु, जो ब्राह्मण थीं, स्कूल में मिले, प्यार की चिंगारी भले ही पहली नजर में न भड़की हो, लेकिन खतों के जरिए उनके दिलों ने धीरे-धीरे एक-दूसरे का हालचाल पूछना शुरू कर दिया.
फिर आया वो दिन जब उन्हें फैसला लेना था – समाज या प्यार? और उन्होंने बिना झिझके प्यार को चुना. दोनों ने साथ रहने की ठानी और एक रात भाग निकले—मृदु के बदन पर बस एक 10 रुपये की साड़ी थी, न कोई धूमधाम, न परिवार का आशीर्वाद, बस एक-दूसरे पर अटूट विश्वास. शादी मंदिर में चुपचाप हो गई.
फिर अब 64 साल बाद, उनके पोते-पोतियों ने ऐसा सरप्राइज दिया कि हर आंख नम हो गई, उन्होंने उनके लिए वही शादी समारोह आयोजित किया, जो बरसों पहले अधूरा रह गया था,
रिश्तेदार जुटे, मंडप सजा और इस बार परिवार ने उन्हें आशीर्वाद दिया, पवित्र अग्नि के सामने जब हर्ष और मृदु ने दोबारा सात फेरे लिए, तो ऐसा लगा मानो वक्त भी उनके प्यार को सलाम कर रहा हो.



