पटना में कानून व्यवस्था पर सवाल: उद्यमी गोपाल खेमका की हत्या से गरमाई सियासत

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Patna: राजधानी पटना की सुरक्षा व्यवस्था पर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं. बिहार पुलिस का यह दावा कि पटना एक सुरक्षित शहर है, अब टिक नहीं पा रहा है. अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि अब वे शहर के प्रतिष्ठित और अत्यधिक संरक्षित इलाकों में भी वारदात को अंजाम देकर आसानी से फरार हो जाते हैं.

हालिया घटना ने पूरे राज्य को झकझोर दिया है. बिहार के प्रसिद्ध उद्योगपति और एक समय पटना के अग्रणी अस्पताल ‘मगध हॉस्पिटल’ के मालिक रहे गोपाल खेमका की शुक्रवार रात उनके अपार्टमेंट के गेट पर हत्या कर दी गई. यह घटना गांधी मैदान जैसे वीआईपी क्षेत्र में हुई, जो पटना का सबसे सुरक्षित माना जाने वाला इलाका है.

गोपाल खेमका न केवल एक सफल उद्योगपति थे, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी सक्रिय व्यक्ति माने जाते थे. उनका भारतीय जनता पार्टी से वर्षों पुराना जुड़ाव रहा है. वह लघु उद्योग प्रकोष्ठ के बिहार प्रदेश संयोजक भी रह चुके थे. हालांकि, उनके बेटे गुंजन खेमका की दिसंबर 2018 में हत्या के बाद वह राजनीति और व्यवसाय दोनों से लगभग दूर हो गए थे.

गुंजन खेमका की हत्या भी कम सनसनीखेज नहीं थी. हाजीपुर के पास पासवान चौक क्षेत्र में स्थित उनकी कार्टन फैक्टरी जाते समय उनकी कार पर दिन-दहाड़े अंधाधुंध फायरिंग कर अपराधियों ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया था. इससे पहले 2016 में भी उन पर जानलेवा हमला हो चुका था, लेकिन तब वह बच गए थे. मगर 2018 की घटना में उन्हें कई गोलियां लगीं और डॉक्टर उन्हें नहीं बचा सके. उनके साथ मौजूद ड्राइवर भी घायल हुआ था.

बेटे की हत्या ने गोपाल खेमका को भीतर तक तोड़ दिया. उन्होंने न केवल अपना अस्पताल बेच दिया, बल्कि सामाजिक जीवन से भी दूरी बना ली. उनका राजनीतिक रुझान भी धीरे-धीरे खत्म होता चला गया. करीब साढ़े छह साल बीतने के बाद जब उनका जीवन कुछ हद तक सामान्य हो रहा था, तब यह दूसरी त्रासदी सामने आई.

बताया जाता है कि शुक्रवार रात वे पटना क्लब में अपने कुछ साथियों से मिलने गए थे. वहीं से लौटने के बाद, उनके अपार्टमेंट के बाहर अज्ञात अपराधियों ने उन पर हमला कर दिया. हमलावर मौके से फरार हो गए और पुलिस अब तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाई है.

इस घटना ने बिहार की गिरती कानून व्यवस्था को एक बार फिर उजागर कर दिया है. लगातार वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का तबादला होने के बावजूद अपराधियों में किसी प्रकार का भय नजर नहीं आता. कारोबारी वर्ग, खासकर मारवाड़ी समाज, जो परंपरागत रूप से बीजेपी का समर्थक रहा है, अब असुरक्षित महसूस कर रहा है.

पटना जैसे शहर में इस तरह की घटनाएं न केवल प्रशासन की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं, बल्कि आम नागरिकों के मन में असुरक्षा की भावना को भी गहरा करती हैं. गोपाल खेमका की हत्या ने यह साबित कर दिया है कि बिहार में कानून व्यवस्था अब सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है.

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