इजरायल-ईरान संघर्ष: दुनिया दो धड़ों में बंटी, भारत ने कूटनीति का रास्ता अपनाया

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New Delhi: इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक स्तर पर गंभीर राजनीतिक विभाजन पैदा कर दिया है. जहां एक ओर अमेरिका, फ्रांस, यूके, जर्मनी और इटली जैसे पश्चिमी देश इजरायल का खुलकर समर्थन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर चीन, यमन, इराक, तुर्किये और ओमान जैसे देश इजरायल की कार्रवाई की आलोचना कर रहे हैं. भारत ने इस विवादास्पद मुद्दे पर संतुलित रुख अपनाते हुए बातचीत और कूटनीति की वकालत की है.

इजरायल का पक्ष: सुरक्षा और अस्तित्व की लड़ाई
इजरायल का कहना है कि उसका यह हमला आत्मरक्षा के तहत किया गया है और इसका उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना है. इजरायल के अनुसार, ईरान की बढ़ती परमाणु क्षमता न केवल क्षेत्र के लिए, बल्कि वैश्विक शांति के लिए भी खतरा है. अमेरिका सहित कई पश्चिमी देशों ने इस दावे का समर्थन किया है.

वैश्विक समर्थन: अमेरिका, फ्रांस, यूके, जर्मनी, इटली
अमेरिका, जर्मनी और फ्रांस ने इजरायल के आत्मरक्षा के अधिकार को समर्थन दिया है. फ्रांसीसी विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने कहा कि पेरिस को ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर गहरी चिंता है. जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने भी क्षेत्रीय अस्थिरता से बचने की बात करते हुए इजरायल की सुरक्षा का समर्थन किया. इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो तजानी ने भी क्षेत्र में सैन्य तनाव को खतरनाक बताते हुए ईरान से संयम बरतने की अपील की. ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने भी कहा कि सभी पक्षों को पीछे हटकर तनाव कम करना चाहिए.

विरोध में खड़े देश: चीन, यमन, इराक, तुर्किये, ओमान
चीन ने इजरायल की कार्रवाई की आलोचना करते हुए कहा कि यह ईरान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन है. चीन के विदेश मंत्रालय ने इसे क्षेत्रीय शांति के लिए खतरनाक बताया. तुर्किये और पाकिस्तान ने भी हमले की कड़ी निंदा की है. पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा कि यह अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है और पाकिस्तान ईरान के साथ खड़ा है. कतर और ओमान जैसे खाड़ी देशों ने भी इजरायल की कार्रवाई की आलोचना की है और इसे क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए हानिकारक बताया है.

भारत की स्थिति: संतुलन और कूटनीति की अपील
भारत ने इस मामले में स्पष्ट रूप से कहा है कि उसने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के उस बयान में भाग नहीं लिया, जिसमें इजरायल की निंदा की गई थी. विदेश मंत्रालय ने कहा कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरानी समकक्ष के साथ बातचीत की और तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक समाधान का समर्थन किया.

भारत ने कहा कि बातचीत और कूटनीति ही तनाव घटाने का एकमात्र रास्ता है. भारत ने एससीओ के अन्य सदस्य देशों को अपनी स्थिति से अवगत करा दिया है. इजरायल और ईरान के बीच यह संघर्ष केवल एक क्षेत्रीय विवाद नहीं रहा, बल्कि वैश्विक राजनीति के ध्रुवीकरण का प्रतीक बन चुका है. भारत जैसे देशों की कूटनीतिक संतुलन की नीति यह दर्शाती है कि अब भी बातचीत और समझौते की गुंजाइश बाकी है. जब पूरी दुनिया युद्ध और शांति के दो रास्तों पर खड़ी हो, तब संवाद ही सबसे बड़ी उम्मीद बनता है.

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