Jhar Media: 16 जुलाई से शुरू होने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा को लेकर देशभर के श्रद्धालुओं में उत्साह है. ओडिशा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर आस्था का एक प्रमुख केंद्र है. यहां भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की काष्ठ (लकड़ी) की मूर्तियां विराजमान हैं. इन मूर्तियों से जुड़ी कई ऐसी धार्मिक मान्यताएं और परंपराएं हैं, जो सदियों से लोगों की जिज्ञासा का विषय बनी हुई हैं.

नवकलेवर: जब बदली जाती हैं भगवान की मूर्तियां
विशेष अवसर पर होने वाली नवकलेवर परंपरा के तहत भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन की लकड़ी की मूर्तियों को बदला जाता है. यह प्रक्रिया आमतौर पर 12 से 19 वर्षों के अंतराल पर होती है, जब हिंदू पंचांग के अनुसार विशेष संयोग बनता है.
धार्मिक मान्यता है कि पुरानी मूर्ति के भीतर मौजूद ‘ब्रह्म पदार्थ’ को अत्यंत गोपनीय तरीके से नई मूर्ति में स्थापित किया जाता है. इस ब्रह्म पदार्थ को लेकर अनेक मान्यताएं प्रचलित हैं. कुछ श्रद्धालु इसे भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ा दिव्य तत्व मानते हैं. हालांकि, मंदिर प्रशासन या वैज्ञानिक स्तर पर इसकी प्रकृति की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.

ब्रह्म पदार्थ के स्थानांतरण की परंपरा
मान्यता के अनुसार, ब्रह्म पदार्थ को एक मूर्ति से दूसरी मूर्ति में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया पूरी गोपनीयता के साथ संपन्न होती है. इस दौरान केवल निर्धारित सेवायत (पुजारी) ही इस अनुष्ठान में शामिल होते हैं. धार्मिक कथाओं के अनुसार, सेवायतों की आंखों पर पट्टी बांधी जाती है और वे विशेष सावधानी के साथ इस अनुष्ठान को पूरा करते हैं.
सोशल मीडिया और लोककथाओं में यह दावा भी किया जाता है कि इस दौरान पूरे पुरी शहर की बिजली बंद कर दी जाती है, लेकिन इस दावे की आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है.
नीम के पवित्र वृक्ष का चयन भी होता है विशेष नियमों के तहत
भगवान जगन्नाथ की नई मूर्तियां साधारण लकड़ी से नहीं बनाई जातीं. इसके लिए विशेष प्रकार के पवित्र नीम (दारु) वृक्ष का चयन किया जाता है. धार्मिक परंपराओं के अनुसार, इस वृक्ष के चयन के लिए कई विशेष मानदंड होते हैं, जिनमें शामिल हैं—
* वृक्ष में चार मुख्य शाखाएं होना.
* आसपास श्मशान, चींटियों की बांबी और जलाशय का होना.
* जड़ के पास सांप का बिल होना.
* वृक्ष का किसी तिराहे पर स्थित होना या तीन पहाड़ियों से घिरा होना.
* आसपास वरुण, बेल और सहादा जैसे वृक्षों का होना.
इन सभी संकेतों के आधार पर ही मूर्तियों के निर्माण के लिए उपयुक्त वृक्ष का चयन किया जाता है.
आस्था और रहस्य का अनोखा संगम
पुरी का जगन्नाथ मंदिर अपनी प्राचीन परंपराओं, धार्मिक अनुष्ठानों और अनूठी मान्यताओं के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध है. ब्रह्म पदार्थ और नवकलेवर जैसी परंपराएं आज भी श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था का विषय हैं. हालांकि, इनसे जुड़े कई दावे धार्मिक विश्वासों और लोकमान्यताओं पर आधारित हैं, जिनकी वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है. यही कारण है कि भगवान जगन्नाथ की ये परंपराएं आज भी लोगों के बीच श्रद्धा और जिज्ञासा दोनों का केंद्र बनी हुई हैं.
जय जगन्नाथ स्वामी 🙏


