राजनीति का क्रूर चेहरा: पटना में अमर शहीद रामफल मंडल के बुजुर्ग बेटे को नहीं मिली कुर्सी, जमीन पर बैठकर खाना खाने की तस्वीर वायरल

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Patna: देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर शहीद रामफल मंडल के परिवार के साथ राजनीति के नाम पर एक बेहद शर्मनाक वाकया सामने आया है। पटना में आयोजित एक राजनीतिक कार्यक्रम में शहीद के बुजुर्ग बेटे और उनके परिजनों को कथित तौर पर सम्मान के नाम पर आमंत्रित किया गया था। लेकिन कार्यक्रम के दौरान उन्हें बैठने के लिए एक कुर्सी तक नसीब नहीं हुई, जिसके बाद सोशल मीडिया पर एक झकझोर देने वाली तस्वीर तेजी से वायरल हो रही है।

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इस वायरल तस्वीर में शहीद रामफल मंडल के सगे पुत्र और परिवार के अन्य सदस्य जमीन पर बैठकर खाना खाते हुए दिखाई दे रहे हैं। बेहद अफसोसजनक बात यह रही कि उनके ठीक बगल में अन्य लोग कुर्सियों पर आराम से बैठे हुए थे, जबकि देश के इस महान सपूत के जीवित इतिहास को फर्श पर बैठकर भोजन करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

भाषणों में सम्मान, व्यवहार में अपमान?

यह घटना बिहार की राजनीति में शहीदों के नाम पर होने वाली ‘वोट बैंक’ की सियासत पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है। बिहार का शायद ही कोई ऐसा राजनीतिक दल हो, जो चुनाव आते ही मंचों से शहीद रामफल मंडल के बलिदान और उनके विचारों की दुहाई न देता हो। लेकिन जब उन्हीं के परिवार को वास्तविक सम्मान देने की बारी आई, तो आयोजकों की संवेदनशीलता पूरी तरह से गायब दिखी।

सोशल मीडिया पर लोग इस घटना को लेकर अपनी गहरी नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि:

* शहीदों के परिवारों को मंच पर बुलाकर केवल माला पहनाना या उनके नाम पर नारे लगाना आसान है।

* असली सम्मान तब झलकता है जब आपके व्यवहार में उनके प्रति आदर और अपनेपन का भाव हो।

* यदि राजनीतिक दल शहीदों के परिवारों को एक सम्मानजनक जीवन या न्यूनतम आदर भी नहीं दे सकते, तो उन्हें उनके नाम पर राजनीति करना तुरंत बंद कर देना चाहिए।

कौन थे अमर शहीद रामफल मंडल?

शहीद रामफल मंडल भारत के स्वतंत्रता संग्राम के उन महान नायकों में से एक हैं, जिन्होंने महज 19 वर्ष की उम्र में देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लोहा लिया था।

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इतिहास के पन्नों में अपनी शहादत दर्ज कराने वाले इस महापुरुष के परिवार के साथ हुआ यह बर्ताव यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारा समाज और हमारे राजनेता वाकई शहीदों के बलिदान की कद्र करना जानते हैं, या यह सिर्फ चुनावी मंचों तक ही सीमित है?

 

 

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